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Tuesday, October 30, 2012

शब्दों के खंडहर ....!



कोई प्रसंग नहीं,
चिंतन नहीं,
सृजन की भूमिका भी नहीं,
न कोई योग बना,
न कुछ प्रत्यक्ष हुआ,
बस, अंतस के अकाल पर,
शब्दों के बूँद,
झमा-झम बरस गए,
और...
पंक्तियाँ गुनगुनाने लगीं,
तीसरी पंक्ति,
उषा सी, क्षितिज पर,
चटक गयी...।
तक्षशिला के खंडहर बने
थोड़े शब्द,
उदास थे,
कुछ दूर खड़े थे,
कुछ मेरे आस-पास थे,
बैठे-बैठे, अंतिम पंक्ति,
स्वयं निकल आई,
मूक तो लगी थी मुझे वो,
परन्तु..
अब धीरे-धीरे बोलने लगी है .... !!