
रात का मंजर हो सितारों की कोई बात हो
जिक्र हो फूलों का बहारों की कोई बात हो
रेत पर चल कर गए जो पाँव कुछ हलके से थे
गुम निशानी है तो इशारों की कोई बात हो
नाखुदा गर भूल जाए जो कभी मंजिल कोई
मोड़ लो कश्ती वहीं किनारों की कोई बात हो
आ ही जाते हैं कभी बदनाम से साए यूँ हीं
बच ही जायेंगे जो दिवारों की कोई बात हो
बुझ रही शरर मेरी आँखों की सुन ले 'अदा'
देखूं तेरी आँखों से उन नजारों की कोई बात हो