आईने में जब भी हम अपना चेहरा देखें हैं
तेरे चेहरे से क्यों लिपटा नज़र आता है
खुशनसीबी ढूंढ़ते फिरते हैं हम हाथों में
बदनसीबी का क्यों पहरा नज़र आता है
लगा डाले हैं कई पैबंद हमने नासूरों पर
जाने क्यूँ फिर भी कुछ उधड़ा नज़र आता है
इश्क में लुटने का ग़म कौन कमबख्त करता है
ग़म ये है तू मेरा है, पर उसका नज़र आता है
नाखुदा से भी अब हम लगाये क्या उम्मीद
वो ख़ुद ही लहरों से जब डरा नज़र आता है
भीड़ की भीड़ गुम गयी है इस शहर में आज
और ये शहर भी अब लापता नज़र आता है
अब 'अदा' पीछा करे तो कहो किसका करे
वक़्त जब ख़ुद ही यहाँ ठहरा नज़र आता है