आज कोई गाना नहीं है बजाने को...रात रेकॉर्डिंग ही नहीं कर पाए......
लेकिन कल बहुत ही सुन्दर सा गाना होगा आप लोगों की नज़र.....पक्का !!
फिलहाल ये कविता....दोबारा छाप रहे हैं हम.....
हम खुद से बिछड़ रहे हैं
हालात बिगड़ रहे हैं
अब कहाँ उड़ पायेंगे
पंख मेरे झड़ रहे हैं
तूफाँ कुछ अजीब आया
हिम्मत के पेड़ उखड़ रहे हैं
महफूज़ मकानों में बसे थे
वो मकाँ अब उजड़ रहे हैं
हमसफ़र साथ थे कई
पर आज बिछड़ रहे हैं
आईना है या हम हैं 'अदा'
अक्स क्यूँ बिगड़ रहे हैं ??
