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Friday, September 18, 2009

अब मिल के भी कहाँ हमें वो मिलते हैं


अब मिल के भी कहाँ हमें वो मिलते हैं
इक चेहरे में पशेमाँ कई लोग मिलते हैं

महफ़िल में रौनक है उनके ही दम से
खुश हैं लोग सभी और हम जलते हैं

रात भर का है मेहमाँ ये चाँद भी सुनो
अब घर से हम बहुत कम निकलते हैं

वो मर गया 'अदा' और दफन हो गया
अब किससे ये कहें के हम रोज़ मरते हैं



रिश्तों की एलास्टिक

तुम हर बार मुझे
ऐसे ही सताते हो
पहले करीब लाते हो
फिर दूर हटाते हो
जानती हूँ तुम्हें
अच्छा लगता है
मुझे रुलाना
और बाद में
मनाना
अपनी मर्ज़ी के
इल्ज़ाम लगाना
उनके वजूद को
ज़बरन पुख्ता बनाना
ये अच्छा नहीं है
कहे देती हूँ
इस तरह बार-बार
खींचोगे तो
रिश्तों की एलास्टिक
ख़राब हो जायेगी
फिर वो ज़रबंद के भी
काम नहीं आएगी