वो..!
शुद्ध भाव, प्रबुद्ध शैली,
बोली बोले मीत सा..
बोली बोले मीत सा..
मै..!
अधर अक्षम, भाव जर्जर,
गीत मेरा अगीत सा,
गीत मेरा अगीत सा,
वाणी मेरी क्षीण सी,
अश्रु कोटर रीत सा,
देह मेरी सकुचा गई,
मन मगर विस्तृत सा,
झुक गई गर्दन हमारी,
झुक गए हैं नयन दोउ,
कृतज्ञं हूँ, ज्ञापन करूँ,
मेरी अर्चना संगीत सी,
सानिध्य तेरा स्वर्ग सा,
हार, जीत प्रतीत सा,
दृग मेरे पथ जोहते हैं,
अश्रु कोटर रीत सा,
देह मेरी सकुचा गई,
मन मगर विस्तृत सा,
झुक गई गर्दन हमारी,
झुक गए हैं नयन दोउ,
कृतज्ञं हूँ, ज्ञापन करूँ,
मेरी अर्चना संगीत सी,
सानिध्य तेरा स्वर्ग सा,
हार, जीत प्रतीत सा,
दृग मेरे पथ जोहते हैं,
प्रिय तू प्रथम प्रीत सा..!
तुम्हें याद होगा कभी हम मिले थे ...
ये गीत सुनिए...आवाज़....'अदा' और संतोष जी..