काव्य मंजूषा
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Saturday, July 25, 2009
सुर्खाब हैं ज़िन्दगी...
न तुमने जाना न मैंने ही पहचाना
ज़िन्दगी ख्वाब है या ख्वाब है ज़िन्दगी
हँसते हुए चेहरों की भीड़ सी लगी है
कहकशाँ से परेशाँ अज़ाब है ज़िन्दगी
न आने का पूछा,ना जाने की रजा-मंदी
आने-जाने के दरमियाँ सुर्खाब है ज़िन्दगी
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