प्रभु तुम्हारी दुनिया में, इतना अन्याय क्यों होता है ?
जीत-हार के अन्तराल में, निर्दोष बलि क्यों चढ़ता है?
युद्ध धनिक का महज मनोरंजन, निर्धन ही सब खोता है
अट्टहास करते नेतागण, सिर्फ गरीब ही रोता है
सदियों से यही कहानी, मानव सुनता आया है
हर युग में इतिहास स्वयम् को, बार-बार दोहराया है
त्रेता, द्वापर या कलियुग में, जितने भी जो युद्ध हुए
सिर्फ बे-नाम, लाचार ग़रीब, विप्र ही प्राण गँवाया है
सारे ध्रितराष्ट्र अपने घर के, अन्दर में छुप जाते हैं
और संजय उन सबको फिर, युद्ध का हाल दिखाते हैं
इस युग में भी कई बार, युद्ध के बादल छाये हैं
और युद्ध की परिणति पर, कई अशोक पछताए हैं
पर उससे क्या होता है, युद्ध तो अब भी जारी है
जीत चाहे जिसकी भी हो, मानवता सिर्फ हारी है