
टूटे हैं जो रिश्ते आज वो लगते हैं बस झूठे हैं
प्रीत डगर के काँटों से मेरे पाँव के छाले फूटे हैं
शिकवों का दस्तूर नहीं ना है गिलों का ही रिवाज
नेह की वो सारी कोंपल बस कागज़ के गुल-बूटे हैं
कई रतजगे कट गए हर ख़्वाब को तब ही पाला है
पल भर को जो आँख लगी कोई ख़्वाब का लश्कर लूटे है
सोचा तो था बस तेरे नाम के सारे निशाँ मिटा देंगे
पर दिल के पत्थर पर आकर तेरी याद के खंज़र टूटे हैं
झीनी सी ख़ामोशी 'अदा' वो पाँव से लिपटी तन्हाई
मुझे गुमसुम से कुछ राह मिले पर जाने क्यूँ वो रूठे हैं

अरुण यह मधुमय देश
अरुण यह मधुमय देश हमारा।
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को
मिलता एक सहारा।
सरस तामरस गर्भ विभा पर
नाच रही तरुशिखा मनोहर।
छिटका जीवन हरियाली पर
मंगल कुंकुम सारा।।
लघु सुरधनु से पंख पसारे
शीतल मलय समीर सहारे।
उड़ते खग जिस ओर मुँह किए
समझ नीड़ निज प्यारा।।
बरसाती आँखों के बादल
बनते जहाँ भरे करुणा जल।
लहरें टकरातीं अनंत की
पाकर जहाँ किनारा।।
हेम कुंभ ले उषा सवेरे
भरती ढुलकाती सुख मेरे।
मदिर ऊँघते रहते जब
जग कर रजनी भर तारा।।
- जयशंकर प्रसाद
शायद ..आप में से कुछ ने इस गीत को पहले भी सुना हो....मुझे नया गीत रिकॉर्ड करने का समय नहीं मिला...सोचा श्री जयशंकर प्रसाद जी की अमर कृति को भी सुन लीजिये...इस गीत को हिंद-युग्म द्वारा आयोजित संगीत प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ था....
आवाज़ : स्वप्न मंजूषा 'अदा'
संगीत : श्री संतोष शैल