
मैं अपने सभी मित्रों से, पाठकों से और मेरे अपनों से एक बात स्पष्ट करना चाहती हूँ...
मैं किसी भी 'वाद' के पक्ष में नहीं हूँ...'जियो और जीने दो' जैसी बात का ही समर्थन करती हूँ...
हम बहुत भाग्यवान हैं...जो अंतरजाल जैसी सुविधा मिली है....दूर होते हुए भी आपस में निकटता बढ़ी है....कम से कम मन से तो बहुत पास हैं हम सभी....इस निजता को और निखारते हुए कुछ बहुत ही अच्छा कर जायेंगे तो आने वाली पीढ़ी कृतज्ञं रहेगी हमारी.....तो आज से ही शुरुआत करते हैं....आइये न...!!
इसी भावना को सामने रखते हुए मेरी यह कविता समर्पित है....आपको..आपको...और आपको भी...
स्वीकार कीजिये ...!!!!

जन जन के धूमिल प्राणों में
मंगल दीप जले
तन का मंगल,मन का मंगल
विकल प्राण जीवन का मंगल
आकुल जन-तन के अंतर में
जीवन ज्योत जले
मंगल दीप जले
विष का पंक ह्रदय से धो ले
मानव पहले मानव हो ले
दर्प की छाया मानवता को
और ना व्यर्थ छले
मंगल दीप जले
आज अहम् तू तज दे प्राणी
झूठा मान तेरा अभिमानी
आत्मा तेरी अमर हो जाए
काया धूल मिले
मंगल दीप जले