
जो टूटा कल औ बिखर गया वो आज समंदर कैद में है
खौफ के साए रेंग रहे वो प्यार का मंजर कैद में है
यूँ हीं तूने मुझे जाँ कहा और यूँ हीं कहा मुझे जानाँ
यूँ हीं लफ्ज़ अब डूब गए और रूहे-सुखनवर कैद में है
सड़कें कितनी खाली हैं और बाहर कितना सन्नाटा
अरमानों और ख़्वाबों के कई लाव-लश्कर कैद में हैं
फ़िक्र कहाँ किसी की मुझे कोई रंज भी अब नहीं तारी
फूल सा दिल पत्थर हुआ पत्थर का ज़िगर कैद में है
वो रौनक वाले दिन थे 'अदा' और आज अजीब आलम है
बस उम्र से खुशियाँ रूठ गईं अब मस्त कलंदर कैद में है
रूहे-सुखनवर=कवि की आत्मा
अब सुनिए यह गीत :
'प्रथम रश्मि का आना' स्वर स्वप्न मंजूषा 'अदा' , संगीत संतोष शैल.....
पंत की कविता 'प्रथम रश्मि'
प्रथम रश्मि का आना रंगिणि!
तूने कैसे पहचाना?
कहां, कहां हे बाल-विहंगिनि!
पाया तूने यह गाना?
सोयी थी तू स्वप्न नीड़ में,
पंखों के सुख में छिपकर,
ऊंघ रहे थे, घूम द्वार पर,
प्रहरी-से जुगनू नाना।
शशि-किरणों से उतर-उतरकर,
भू पर कामरूप नभ-चर,
चूम नवल कलियों का मृदु-मुख,
सिखा रहे थे मुसकाना।
स्नेह-हीन तारों के दीपक,
श्वास-शून्य थे तरु के पात,
विचर रहे थे स्वप्न अवनि में
तम ने था मंडप ताना।
कूक उठी सहसा तरु-वासिनि!
गा तू स्वागत का गाना,
किसने तुझको अंतर्यामिनि!
बतलाया उसका आना!
छिपा रही थी मुख शशिबाला,
निशि के श्रम से हो श्री-हीन
कमल क्रोड़ में बंदी था अलि
कोक शोक में दीवाना।
प्रथम रश्मि का आना रंगिणि
तूने कैसे पहचाना?
कहाँ-कहाँ हे बाल विहंगिनी
पाया तूने यह गाना?