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Tuesday, July 21, 2009

कुछ कुछ कुछ कुछ कह जाता

जब ख्वाब ख़ुद हकीक़त की दीवार में चुन जाते है
सात समंदर पार का सपना, सपना ही रह जाता है

हर दिन आईने के आगे, अब ठहरना मुश्किल है
अक्स देखते ही ख़्वाबों का, ताजमहल ढह जाता है

मुड़ कर देखा जब ख़ुद को, खालीपन था चेहरे पर
पाने से ज्यादा खोने की, कई कहानी कह जाता है

रिमझिम सी फुहार हैं छाई, भीज रहे अंगना, अंगनाई
देखो न सब भीज गए हैं इक मेरा मन रह जाता है

तू ऐसे मत देख मुझे, हैं कई सवाल तेरी आँखों में
रुख की शिकन ठहर गयी, न माथे से ये बल जाता है

तेरी है क्या औकात ' अदा', जो तू कोई ग़ज़ल कहे
वो तो कोई और है जो कुछ कुछ कुछ कुछ कह जाता है