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Saturday, July 25, 2009

किसी के मारे हम कहाँ मरते...

किसी के मारे हम कहाँ मरते,
हमें तो सब्र-ओ-क़रार ने मारा

जान तो फिर भी अटकी रही,
तुम न आए,इंतज़ार ने मारा

गुलों से हैं लिपटे यही भरम था
दामन में छुपे खार ने मारा

शिकस्त-ऐ-ज़िन्दगी से कैसा गिला
मौत हारी हमसे,इस हार ने मारा