काव्य मंजूषा
Showing posts with label
किसी के मारे हम कहाँ मरते...
.
Show all posts
Showing posts with label
किसी के मारे हम कहाँ मरते...
.
Show all posts
Saturday, July 25, 2009
किसी के मारे हम कहाँ मरते...
किसी के मारे हम कहाँ मरते,
हमें तो सब्र-ओ-क़रार ने मारा
जान तो फिर भी अटकी रही,
तुम न आए,इंतज़ार ने मारा
गुलों से हैं लिपटे यही भरम था
दामन में छुपे खार ने मारा
शिकस्त-ऐ-ज़िन्दगी से कैसा गिला
मौत हारी हमसे,इस हार ने मारा
Older Posts
Home
Subscribe to:
Comments (Atom)