जनाब रिफ़त 'सरोश' साहब की ये ग़ज़ल है, ये ग़ज़ल मुझे बहुत बहुत बहुत पसंद है.....
बहुत साल पहले उन्होंने मुझसे कहा था 'बेटा ये मेरी किताब है, और अब तुम्हारी है मैं चाहता हूँ आप इसमें से अपनी पसंद की ग़ज़लों को धुन में ढालें और गायें' वो दिन और आज का दिन नहीं कर पायी मैं, अब जाकर पता चला की वो इस दुनिया में रहे ही नहीं...बस मन कुछ बैठ सा गया...एक कच्ची-पक्की सी धुन बनायीं है...जो अभी बन ही रही है......अब पता नहीं कब बने.... जो भी बनी है सुन लीजिये...
शायर : जनाब रिफ़त 'सरोश'
संगीत : संतोष शैल
आवाज़ : स्वप्न मंजूषा शैल 'अदा'
किसने कहा हुजूर के तेवर बदल गए
रुख की शिकन गयी है न माथे के बल गए
उलटी पड़ी है आज मोहब्बत की हर बिसात
ये शातिराने दैहर अजब चाल चल गए
उस अंजुमन में जब उठे सरगराँ उठे
उस अंजुमन में जब भी गए सर के बल गए
क्या लेके जाएँ बज़्म-ए-सुख़न में सिवा-ए-दिल
अल्फाज़ फ़िक्र-ओ-फन की तमाज़त से जल गए
मंजिल पुकारती ही रही ठहरिये 'सरोश'
हम बे-खुदी-ए-शौक़ में आगे निकल गए