Thursday, July 24, 2014

हम हक़ीक़त के हाथों यूँ मरते रहे, बढ़ के पेड़ों से बेलें हटाते रहे.....




ज़िन्दगी के लिए कुछ नए रास्ते हम बनाते रहे फिर मिटाते रहे 
थी वहीँ वो खड़ी इक हसीं ज़िन्दगी हम उससे मगर दूर जाते रहे 

रात रोई थी मिल के गले चाँद से और अँधेरे अँधेरा बढ़ाते रहे 
आँखें बुझने लगीं हैं चकोरी की अब दूर तारे खड़े मुस्कुराते रहे 

बिखरे-बिखरे थे मेरे वो सब फासले हम करीने से उनको सजाते रहे 
अब समेटेंगे हम अपनी नज़दीकियाँ दूरियों को गले से लगाते रहे 

वो पेड़ों के झुरमुट से अहसास थे और ख्वाबों की बेलें लिपटती रहीं 
हम हक़ीक़त के हाथों यूँ मरते रहे बढ़ के पेड़ों से बेलें हटाते रहे

वो तो भूखा मरा मंदिर के द्वार पर लोग प्रतिमा को लड्डू चढ़ाते रहे
इक कली जिस गली में बलि चढ़ गयी वहीँ देवी का मंडप सजाते रहे




26 comments:

  1. आपकी लिखी रचना शनिवार 26 जुलाई 2014 को लिंक की जाएगी...............
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. आपकी लेखनी में जादू है ......... सीधे असर करता है

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (26-07-2014) को ""क़ायम दुआ-सलाम रहे.." (चर्चा मंच-1686) पर भी होगी।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. wah bahut khoob.....ek ek line dil par asar krti hui

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    1. रेवा जी,
      सबसे पहले आपका स्वागत है और हौसलाअफजाई के लिए शुक्रिया है.।

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  5. बिखरे-बिखरे थे मेरे वो सब फासले हम करीने से उनको सजाते रहे
    अब समेटेंगे हम अपनी नज़दीकियाँ दूरियों को गले से लगाते रहे

    बहुत खूब

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    1. स्मिता जी,

      आपका स्वागत है और हृदय से आपका धन्यवाद !

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  6. वाह पेड़ों के झुरमुट से अहसास.............क्‍या अपने से अहसास हैं।

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    1. विकेश,
      बहुत दिनों बाद नज़र आये, ख़ुशी हुई देख कर.।

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  7. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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    1. प्रतिभा जी,

      आपका धन्यवाद !

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  8. बहुत बहुत सुन्दर !
    विशेषतः अंतिम पंक्तियाँ ।

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    1. हेम पाण्डेय जी,
      सुस्वागतम एवम आभार !

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  9. बहुत सुंदर

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  10. और आपका भी धन्यवाद शारदा जी !

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  11. मुझे खेद है कि इतनी खूबसूरत नज़्म बहुत देर से मेरी नज़रों में पडी। एक अजब सा अहसास दिल पर तारी होता चला गया। अपने भावों को आपने बहुत खूबसूरत नक्कशीदारी से संजोया है। मन अनजाने ही "आफरीन " "आफरीन" कह उठा। लेकिन क्षमा करें आख़िरी मकता हालांकि बहुत लाजवाब है , जबरन पेवस्त किया गया सा लगता है। जानता हूँ कि " I'm trespassing upon a restricted teritorry " बहुत नफीस को "बहुत नफीस" कहने से खुद को रोक ना पाया। मरहबा !

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    1. विजय साहेब,
      इस नायाब टिप्पणी के लिए तहे दिल से आपका शुक्रिया।
      आपकी बात सोलह आने सही है, आख़री मक़्ता कुछ ऐसा ही है जैसा आपने कहा है। लेकिन जो बात जब, जिस वक़्त ज़हन में आ जाए उसे कह देना अच्छा रहता है, वर्ना अफ़सोस होता है और मुझे अफ़सोस करना पसंद नहीं। एक बार फिर आपका शुक्रिया इस हौसलाफजाई के लिए ।

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