Wednesday, July 9, 2014

दुनियादारी.....!

वाह री ये दुनियादारी !
कितनी सारी है जिम्मेवारी 
एक साँस लेना है मुश्किल 
दूजा उससे भी भारी
फूल के दर्शन दुर्लभ हो गए  
बस झेल रहे हैं गोला-बारी 
हम बैठे हैं डाल के ऊपर 
दोस्त चलाते धड़ पर आरी
साज़िश रचते मेरे क़त्ल का  
मुँह पर कहते लम्बी उम्र है तुम्हारी !!

16 comments:

  1. वाह री ये दुनियादारी ....
    यही आपाधापी है हर ओर

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    1. इस आपा-धापी का अंत कहाँ है ?
      आपका आभार !

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  2. एक साँस लेना है मुश्किल
    दूजा उससे भी भारी
    ...वाह...बहुत सटीक चित्रण आज की दुनियादारी का...

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  3. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (11.07.2014) को "कन्या-भ्रूण हत्या " (चर्चा अंक-1671)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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    1. इसी आपा-धापी के कारण देर से आपका आभार व्यक्त कर रही हूँ राजेंद्र जी !

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    1. बहुत शुक्रिया राजीव जी !

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  5. सच ज़िंदगी बड़ी उलझी है

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    1. सबके साथ यही समस्या है महेश जी, उलझन सुलझे ना !

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  6. वाह ,बहुत सुंदर

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    1. रामाजय ज़ी, हृदय से आभारी हूँ

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  7. रेवा जी बहुत बहुत धन्यवाद !

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  8. दोस्तों की आरी भोथरी होगी वरना अब तक तो हो गया होता हैप्पी बड्डे :)

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    1. वड्डे नालायक हैं जी म्हारे दोस्त भी, कोई काम ढंग से नहीं करते
      मैनू पता है, मेरा हैप्पी बड्डे भी परमिट ले ले के, लंगी मार-मार कर ही करेंगे :)

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