Monday, August 25, 2014

मेरी मासूम हिमाक़त के सिवा कुछ भी नहीं.....




अब दोस्ती, प्यार, चाहत के सिवा कुछ भी नहीं
ज़िन्दगी क्या है मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं

अगले जन्मों में मेरे साथ सफ़र का वादा
तेरी इक और शरारत के सिवा कुछ भी नहीं

प्यार औरों को मिला और मेरी क़िस्मत में
एक पत्थर की इबादत के सिवा कुछ भी नहीं

चीरकर सीना मेरा आप तसल्ली कर लें
दिल में आपकी सूरत के सिवा कुछ भी नहीं

अपने हाथों की लकीरों में सजाना तुमको
मेरी मासूम हिमाक़त के सिवा कुछ भी नहीं

ख़्वाहिशे-वस्ल न शिकवे न शिकायत दिल में
आख़िरी दीद की हसरत के सिवा कुछ भी नहीं

ऊँचे क़द वालों से ज़रा फ़ासला ही रख्खो 
वर्ना हाथ आएगी, ज़िल्लत के सिवा कुछ भी नहीं

ख़्वाहिशे-वस्ल = मिलन की इच्छा 

16 comments:

  1. सुन्‍दर मोहब्‍बती भाव।

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  2. चाहत, मोहब्बत, इबादत, शरारत सबकुछ तो है फ़िर भी शिकायत !!
    अंदाज-ए-शिकायत अच्छा है,

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    1. @अंदाज-ए-शिकायत अच्छा है

      इसे मैं रवायत समझूँ या अदावत :)

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    2. ज़िल्ले-सुभानी, त्वाडी वड्डी मेहेरबानी
      वड्डे लोग वड्डी बातें !

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  3. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवार के लिए चुरा ली गई है- चर्चा मंच पर ।। आइये हमें खरी खोटी सुनाइए --

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  4. इस चोरी के लिए आपका हृदय से आभार रविकर जी !

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  5. अनुपम भाव संयोजित किये हैं आपने ... बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ...आभार

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    1. हमेशा खुश रहो भास्कर !

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  6. पढते-पढते मुह्हबत हो गयी---कुछ ते्री गज़ल यूं उतर गई.

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  7. मन के मनकों पर ये रंग चढ़ना ही था
    कौन बच पाया है इससे ये तो होना ही था
    शुक्रिया, करम, मेहेरबानी !

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