Tuesday, February 8, 2011

क्या जाने मार डाले, ये दीवानापन कहाँ....

तेरे बग़ैर, सुरूर-ओ-लुत्फ़-ओ-फ़न कहाँ
ज़िक्र न हो तेरा, फिर वो सुख़न कहाँ

मिलते हैं सफ़र में, हमसफ़र, रहबर कई
वीरान से रस्तें हैं, पर वो राहजन कहाँ

हैरत में पड़ गई हैं, ख़ामोशियाँ हमारी
मैं झूलती क़वा में, मुझमें जीवन कहाँ

तेरे हुज़ूर में ही, अब मेरा ये दम निकले 
क्या जाने मार डाले, ये दीवानापन कहाँ

बस इंतज़ार में ही, आँखें बिछी हुईं हैं 
सब पूछते हैं मुझसे, कि तेरा मन कहाँ


 

13 comments:

  1. बसंत का असर है शायद उस पर

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  2. हम पूछते हैं आपका गाना कहाँ?

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  3. अदा जी मेरे ख़्याल से पहले शे’र की पहली लाइन यूं होनी चाहिए थी-
    "तेरे बग़ैर सुरूर-ओ-लुत्फ़-ओ-फ़न कहाँ"
    जहाँ तक मैं जानता हूँ उर्दु में कोमा नहीं लगाया जाता है इसलिए सुरुर और लुत्फ़ को ओ से जोड़ना जरूरी है। बहरहाल मैं गलत भी हो सकता हूँ।
    पहले शे’र और बाकी अशआर के बहर में भी अंतर है। पर इसे स्वीकार किया जा सकता है क्योंकि आजकल बहुत से लोग ग़ज़ल में मीटर फ़ालो नहीं करते।

    गीत की कमी खल रही है इस बार।

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  4. ek shabd...."shandaar"
    बसंत पंचमी के अवसर में मेरी शुभकामना है की आपकी कलम में माँ शारदे ऐसे ही ताकत दे...:)

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  5. बहुत खूब ......... लग्ता हे कि आप ने उर्दू अदब का अच्छा मुतालेआ (पड़ाई) कर रखा हे ........

    अप के अशआर (पंखीयोँ) मेँ बहुत रवानी हे....

    ख़ुदा क्रे ज़ोरे क़लम हो और भी ज़ियादा .....

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  6. तेरे हुज़ूर में ही, अब मेरा ये दम निकले
    >
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    कुछ दम ठहर जा ऐ दम, हमदम आ जाएं तो दम निकले :)

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  7. बहुत ही उम्दा .
    तेरे हुज़ूर में ही, अब मेरा ये दम निकले
    क्या जाने मार डाले, ये दीवानापन कहाँ
    सलाम.

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  8. इतना कुछ तो बता दिया आपने, फ़िर भी सब पूछते हैं। देख लीजिये, कैसे कैसे लोग हैं:))
    फ़ोटो आते बसंत की झलक दे रहा है, बसंत पंचमी की शुभकामनायें।
    आज तो गाना जरूर होना चाहिये था।

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  9. वल्लाह...राहजन का भी ख्याल है ! ऐसे 'जी' के लिए बस दुआयें और दुआयें ही निकलती हैं दिल से !

    खूबसूरत लिखा आपने !

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