
सीने में इक सुराख है दर्दों के फौवारे
उठी है हूक दिल में ज्यूँ भरते हैं गुब्बारे
उनकी साफगोई के कायल हुए हैं हम
आँखों में झाँक कर कहा के तुम हो हमारे
न जाने कब उठे हैं, कितनी बार गिरे हैं
जीते हैं कितनी बार कितनी बार हम हारे
कुछ कह रही थीं आपके सीने की धड़कनें
नज़रें तो कर रहीं थी कोई और इशारे
थी रात जहाँ पर वही पर धूप खड़ी थी
जल जाएँ के बुझे बड़े हैरान हैं तारे
चेहरों का क्या है वो हैं सवालों की इक किताब
हम पढ़े तो बहुत समझे नहीं ठहरे बेचारे

सभी तसवीरें गूगल के सौजन्य से......







