Thursday, October 1, 2009

सीने में इक सुराख है दर्दों के फौवारे


सीने में इक सुराख है दर्दों के फौवारे
उठी है हूक दिल में ज्यूँ भरते हैं गुब्बारे

उनकी साफगोई के कायल हुए हैं हम
आँखों में झाँक कर कहा के तुम हो हमारे

न जाने कब उठे हैं, कितनी बार गिरे हैं
जीते हैं कितनी बार कितनी बार हम हारे

कुछ कह रही थीं आपके सीने की धड़कनें
नज़रें तो कर रहीं थी कोई और इशारे

थी रात जहाँ पर वही पर धूप खड़ी थी
जल जाएँ के बुझे बड़े हैरान हैं तारे

चेहरों का क्या है वो हैं सवालों की इक किताब
हम पढ़े तो बहुत समझे नहीं ठहरे बेचारे


सभी तसवीरें गूगल के सौजन्य से......

वो फासले फ़र्जी बनाते रहे


वो फासले फ़र्जी बनाते रहे
हम नाहक उनको मनाते रहे

वो सवालों में हमको उलझाते रहे
हम सवालों के पर्चे सुलझाते रहे

वो वफाओं की तुरही बजाते रहे
हम कानों को हाथ लगाते रहे

वो कमियां हमारी गिनाते रहे
हम गिनने में गड़बड़ाते रहे

वो खताएं हमारी बताते रहे
हम हैं कि 'अदा से मुस्काते रहे

Wednesday, September 30, 2009

मेरे सपने


हिम्मत के
दरवाज़े पर
टंगी
उम्मीद की
पोटली
इंतज़ार की साँकल से
बार-बार टकराती है !
यकीन को
थपथपाती है !
खवाब..
ख्यालों की
कुण्डी खोल कर
अन्दर आ गए हैं
आंखों की सूखी नदी
जाग गयी
अब तय है कि
तूफ़ान बा-दस्तूर
आएगा
मेरे सपने
या डूबेंगे
या फिर किनारे
लग जायेंगे
देखते हैं क्या
होता है
नज़र न लग जाए
इसलिए खामोशी का
एक ढीठौना
तो लगा दिया है मैंने....

Tuesday, September 29, 2009

चुपचाप..



निकले थे हम
यूँ ही
ज़रा सा बाहर
कि मिल गयी
बिखरी सी ज़िन्दगी,
रिश्तों की डोरी,
खुशियों के मंज़र,
दुश्मनों के खंज़र
दोस्तों के पत्थर,
आँखों के समंदर
यादों की कतरन
और भड़कती सी
आग
हमने समेट लिया
सब कुछ
सीने के अन्दर
चुपचाप..

Monday, September 28, 2009

यूँ हीं....


ख्याल आते रहे
सोहबत में
ज़रुरत के
ज़िन्दगी गुज़रती रही

इशारों को कैसे
जुबां दे दें हम
मोहब्बत बच जाए
दुआ निकलती रही

रेत के बुत से
खड़े रहे सामने
पत्थर की इक नदी
गुज़रती रही

रूह थी वो मेरी
लहू-लुहान सी
बदन से मैं अपने
निकलती रही



बेवजह तुम
क्यों ठिठकने लगे हो
मैं अपने ही हाथों
फिसलती रही

आईना तो वो
सीधा-सादा था 'अदा
मैं उसमें बनती
संवरती रही

Sunday, September 27, 2009

टपोरी ने लिखी प्रेम कविता ...पढ़ेंगा क्या


बोले तो बाप, खुदा न करे
कोइय्यीच ऐसा दिन भी आने का
अपुन इधरिच बैठा रहे और
तू पतली गल्ली से निकल जाने का
देख, तेरा अदा-वदा सब सॉलिड है
तेरे को अपुन दिल भी दियेला है
एक दम बिंदास 'लो' कियेला है
पण एक बात आज किलिअर करने का
बस अपुन का
'लो' हफ्ता का टाइम से मिलने का
क्या !!!

कल ओटावा में कवि सम्मलेन में मैंने मेरी ये ग़ज़ल पढ़ी थी, सुने आपको पसंद आएगी ..पक्की बात है..
श्री शरद तैलंग जी, आपने जो सुधार किया था वो सारा डाल दिया है इसमें, आपका बहुत बहुत धन्यवाद, पूरी ग़ज़ल नहीं डाल रही हूँ हाल में ही सबने पढ़ी है...